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ईश्वर की माया, कहीं धुप कहीं छाया अर्थात सर्वशक्तिमान घट-घट के अंतर्यामी , सृष्टि के रचिता परमेश्वर की माया बड़ी अपरम्पार है ! आकाश में अनेक तारागण दिखाई देते हैं ! आकाश में असंख्य तारागण तो साधारण दृष्टि से दिखाई नहीं देते और बड़ी शक्तिशाली दूरबीनो से ही देखें जा सकते हैं ! उनके मध्य में अपना एक सूर्य है जिसका भेद हमारे ऋषियों मुनियों ने प्राचीन काल में ही पा लिया था ! बिना दूरबीन के सहारे सौर जगत से है !

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ज्ञानोपदेश – याद रखना चाहिये कि कर्म बंधन कारक नहीं है, बंधन करक हैं – कर्मफल में आसक्ति तथा कामना ! मन में से कर्मासक्ति और विषयासक्ति को निकाल दो और भगवान के साथ चित् का योग करके भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करो – भलीभांति कर्म करो, फिर वे कर्म बंधनकारक नहीं होंगे , न उनके अनुकूल और प्रतिकूल फलों से चित्त में कोई हर्ष या  उद्वेग ही होगा ! वस्तुतः इस प्रकार तुम स्वत: योगयुक्त हो जाते हो !
भगवान् ही तुम्हारे अपने स्थान हैं , तुम्हारे परम आश्रयस्थल हैं ! उन नित्य देवस्थान में स्थित रहते ही सारे कर्मों का आचरण करो ! फिर चाहे तुम किसी देश, किसी ग्राम, किसी घर में रहो, कोई आपत्ति कि


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